अगर आप हिन्दी साहित्य के शौकीन हैं तो आपके लिए इंटरनेट पर खूब सामग्री उपलब्ध है । बड़ी संख्या में ब्लॉग हैं जिनसे आप अपनी रचनात्मकता की भूख भी मिटा सकते हैं । केवल नेट का उपयोग कर आपको हिन्दी साहित्य का इतिहास मिल सकता है । साहित्य की अन्य सभी विधाएं भी नेट पर मौजूद हैं । हजारों वेबसाइट्स हैं जिन पर जाकर लाखों लोग प्रतिदिन मनपसंद हिन्दी साहित्य खंगालते हैं और उसे पढ़ते हैं । सबसे अधिक हिन्दी काव्य के शौकीन हैं जो अक्सर ऐसी खोज में जुटे रहते हैं । यदि आपको हिन्दी साहित्य से जुड़ी वेबसाइट तलाशनी है तो हिनखोज डॉट कॉम पर जाएं । यहां आपको हजारों ऐसी वेबसाइट के पते मिल जाएंगे । इनमें बड़ी संख्या में ब्लॉग भी हैं जिसमें आप स्वयं भी भाग ले सकते हैं ।
पीढ़ी दर पीढी हिन्दी का लगाव कम हो रहा है । नई पीढ़ी में हिन्दी के प्रति भावनात्मक रिश्ता पैदा करना जरूरी है । आजकल हिन्दी में नए शब्द नहीं बनाए जा रहे हैं । अंग्रेजी शब्दों को लिपि के रूप शामिल कर काम चलाया जा रहा है । यह बिल्कुल गलत है । नए प्रयोग करने होंगे । नए शब्द पर काम बंद होना नहीं चाहिए । पहले पत्रिकाएं हिन्दी के विकास में सहायक होती थीं । समय के साथ एक के बाद एक पत्रिकाएं बंद होती गईं । यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है । डिजिटल युग में हिन्दी को भी आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को जोड़ना जरूरी है । किताबों से दूर होने से युवाओं तक हिन्दी की खासियत पहुंचती नहीं है । डिजिटल माध्यम में भी हिन्दी को मजबूत करना होगा । (राजेन्द्र राव )
हिन्दी बोलचाल और सोशल मीडिया पर उपयोग में शहर मे टॉप पर है । कुछ भी पोस्ट करने से लेकर कमेंट करने तक में लोगों को हिन्दी ही सहज लगती है । गूगल ट्रेंड के आंकड़ों के अनुसार कानपुर हिन्दी बोलने और प्रयोग करने में तीसरे स्थान पर है । यहां 88 फीसदी से अधिक लोग हिन्दी बोलना और प्रयोग करना पसंद कर रहे हैं । इसका उपयोग करने में रायपुर पहले और लखनऊ दूसरे स्थान पर है । सोशल प्लेटफॉर्म और साइबर की दुनिया के विशेषज्ञ राहुल सिंह ने बताया कि सोशल मीडिया पर अब डॉक्टर , शिक्षक , नेता और युवा सभी वर्गों के लोग हिन्दी का अधिक प्रयोग कर रहे हैं ।
हिन्दी अब सिर्फ संपर्क और आम बोलचाल की भाषा नहीं रह गई है । बाजार को भी इसकी सख्त जरूरत महसूस हो रही है । पूरे देश में हिन्दी को बढ़ावा देने को जिस तरह सामाजिक संगठन काम कर रहे हैं । उसी तरह से ऑनलाइन मार्केटिंग पर फोकस करने वाली बड़ी कम्पनियां भी हिन्दी में ग्राहकों को सफिंग का मौका दे रही हैं । मोबाइल कम्पनी एयरटेल ने अपने ग्राहकों के लिए लांच एयरटेल धैक्स एप को हिन्दी में भी उपलब्ध कराया है । इस एप पर ग्राहक हिन्दी में टाइप कर सकते हैं । नेट फ्लिक्स , अमेजन , फ्लिपकार्ट जैसे ऑनलाइन मनोरंजन और शॉपिंग प्लेटफॉर्म भी अपने ग्राहकों को हिन्दी में सर्किंग करने का मौका दे रहे हैं । इनकी वेबसाइट्स और एप पर हिन्दी में टाइप करके सामान खोज सकते हैं ।मोबाइल बनाने वाली कम्पनियों ने अपनाई देश में मोबाइल हैडसेट बनाने वाली लगभग सभी बड़ी कम्पनियों ने हिन्दी को भाषा के रूप में अपना लिया है । उनके भाषा सेटिंग वाले ऑपशन में दुनिया की बाकी भाषाओं की तरह हिन्दी को भी स्थान दिया गया है । इसे सेलेक्ट करने के साथ ही की - वर्ड हिन्दी में आ जाते हैं ।
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा अब तक नहीं बन पाई पर इसके सेवियों ने इसको इतना उच्च स्थान दिला दिया है कि यह स्वत राष्ट्रभाषा बन चुकी है । 14 सितंबर इसी उद्देश्य से हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है कि हम सभी हिन्दुस्तानी इसे बढ़ावा देने के लिए तत्पर हो । हिन्दी की दशा तो ठीक है पर जो दिशा होनी चाहिए . वैसा नहीं है । आज भी हिन्दी लेखकों को वैसा प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है । सरकारी कार्यालयों में हिन्दी सप्ताह महज योजना बनकर रह गया है । हिन्दी में अच्छे काम करने वाले ऐसे लोग जिनसे भाषा को अच्छी दिशा और दशा मिल सके , उनके लिए प्रयास होने चाहिए । हिन्दी की कमाई खाने वाले आज इसके लिए काम नहीं कर रहे । इसके विपरीत दूसरे माध्यमों से अर्जन करने वाले इसके विकास के लिए प्रतिबद्ध है । हिन्दी भाषा लेखन में व्याकरण की अनदेखी काफी बढ़ गई है ।
आजचाहे ई - मेल हो या व्हॉट्सएप हम तेजी से हिन्दी लिख सकते हैं । अन्य भारतीय भाषाएं भी इसी तरह लिखते हैं । यदि लिखने में परेशानी हो रही हो तो इसे बोलकर लिखा जा सकता है । जो बोलते हैं , शब्दश ? वैसा ही लिख जाता है । यह काम एक या दो दिन में नहीं , बल्कि चार दशकों की मेहनत का परिणाम है । इसमें आईआईटी , कानपुर की भूमिका अहम है । आईआईटी , कानपुर में एक समय ऐसा था जब ज्यादातर शिक्षक या छात्र केवल अंग्रेजी जानते थे । संस्थान ऐसे स्थान पर था जहां लोगों का हिन्दी बोलने वालों से हर पल वास्ता रहता था । ऐसे में शुरुआत से ही यहां हिन्दी पर ध्यान दिया गया । एक समय ऐसा भी आया जब हिन्दी विभाग का सृजन भी हुआ । इसमें हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार रहे गिरिराज किशोर की भूमिका अहम रही ।
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